दिल्ली की सीमाओं पर पिछले करीबन तीन महीने से बैठे हुए देश भर के किसानों द्वारा, केंद्र सरकार द्वारा लागू किये गए तीन कृषि बिलों के ख़िलाफ़ आंदोलन जारी है। इस आंदोलन को लेकर सरकार और किसान नेताओं के बीच क़रीबन दस बार वार्तालाप हुआ लेकिन कोई भी पक्ष अपने आप को झुकाने को तैयार नहीं हुआ। जहां किसान नेता इन बिलों को रद्द करवाने को लेकर अड़े रहे वहीं सरकार इन बिलों में सशोधन की बात करती रही।
इन कानूनों को लेकर किसान नेताओं ने गत २६ जनवरी को दिल्ली में ट्रेक्टर रैली निकाली थी जोकि बाद में एक विरोध प्रदर्शन में बदल गई और लाल किले व आश्रम तथा आई टी ओ सहित कई क्षेत्रों में काफी उपद्रव हुआ जिसमे लाल किले पर झंडा लहराने को लेकर कई लोगों पर केश दर्ज़ भी हुआ और सरकार की तरफ से कार्रवाई भी की गई।
इस किसान आंदोलन में मुख्य रूप से पंजाब सूबे की किसान यूनियन थी और ज्यादातर किसान भी पंजाब के ही थे लेकिन २६ जनवरी के घटनाक्रम के बाद सरकार ने पंजाब के किसान नेताओं को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया और आंदोलन में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के किसान नेता राकेश टिक्कैत को आगू बना दिया। राकेश टिक्कैत को गिरफ्तार करने के लिए काफी मात्रा में सुरक्षा बल को भेजने का नाटक भी किया गया और राकेश टिकैत के आंसू तक निकल आये ।
अब पिछले कुछ दिनों से राकेश टिकैत इस आंदोलन के मुख्या नज़र आ रहे है हालांकि पंजाब के किसान नेता अभी भी डटे हुए है और किसान भी कम नहीं हुए है लेकिन टिकैत पुरे देश में घूम घूम कर बड़े बड़े राजनीतिक मंच साँझा करके रैलियां कर रहे है।
इससे सवाल ये उठता है कि क्या इस आंदोलन से राकेश'टिकैत आने वाले समय में अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहे हैं या सरकार अनौपचारिक तरीके से राकेश टिकैत को हवा दे रही है क्युकिं हो सकता है कि सरकार के थिंक टैंक को ऐसे लगता हो कि टिकैत भविष्य में उनकी डूबते हुए को तिनके का सहारा बन सकते है।
ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा कि टिकैत केजरीवाल बनते हैं या बाबा रामदेव लेकिन ये कहा जा सकता है कि इस किसान आंदोलन को सरकार ने राकेश टिकैत की और ध्रुवीकरण कर दिया है।

Can't say.. Depedns upon timr
जवाब देंहटाएंKuchh b ho skta hai
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