किसान मसीहा जननायक चौ: देवीलाल की पुण्यतिथि पर विशेष
एक समय था जब राजनीती जनसेवा का माध्यम थी, सफ़ेद धोती कुर्ते पहने एक साधारण सा शख्स सहसा किसी भी चौक चौराहे में हुक्का गुड़गुड़ाने बैठ जाता था , किसी भी किसान के खेत में उसकी फसल का हाल चाल जानने हेलीकॉप्टर तक उतार देता था , वो जहां भी जाता लोग उस पर विश्वास कर लेते थे , उसके लिए खुद की कोई पैठ सीट या कोई गृहजिला या कोई गढ़ नहीं था वो व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ने जहां कहां से भी चुनाव लड़ कर जीत जाने का मादा रखता था , वो जब दिल्ली कूच करता था तो देश की जनपथिया राजनीती में हलचल होने लग जाती थी ,वो संघर्ष करने का, त्याग करने का आज के राजनेताओं की तरह दिखावा नहीं करता था , उसके जीवन में कोई छुपा हुआ रहस्य नहीं था , एक ऐसा इंसान जिसने अपनी जिंदगी के आठ दशक एक संघर्ष में बिता दिए जिसमे हर हाथ को काम और हर मुँह को रोटी देने की बात कही गई थी , वो एक असाधारण व्यक्तित्व का धनी था जिसको लोग प्यार से ताऊ कहते थे , लोकराज को लोकलाज़ से चलाने वाला वो जननायक चौधरी देवीलाल थे।
चौ: देवीलाल की हर रणनीति में किसान और गरीब के भले की बात थी। उन्होंने कभी मूल्यविहीन राजनीती नहीं की और न ही कहीं सत्ता प्राप्ति के लिए अनैतिक विचारधारा पर चलते हुए कोई समझौता किया। शायद यही कारण रहे होंगे कि लोगों ने उन्हें देश के उस मुकाम पर ला कर खड़ा कर दिया जहां व्यक्ति के मुख से निकला हुआ मात्र एक शब्द किसी को राजा बना सकता था।
चौ: देवीलाल को सत्ता में रहने का अवसर कम मिला या यूँ भी कह सकते है कि कई बार उन्होंने स्वयं सत्ता में रहते हुए सत्ता धारियों का विरोध किया। जब जब सत्ता ने गरीब कमेरे और किसान को लूटने के लिए नीतियां बनाई उन्होंने सत्तासीनों का न सिर्फ विरोध किया बल्कि बड़े से बड़े फैसले भी वापिस लेने का काम करवाया। चौ: साहब जब स्वयं सत्ता में आये तो उन्होंने राजनीती को एक नई दिशा देने का काम किया और ऐसे ऐसे फैसले लिए जो किसी भी राजनेता के सोचने के दायरे से भी बाहर थे। वृद्धा पेंशन उन्ही एक फैसलों में से एक है जो आज चुनाव और घोषणापत्र का मुख्य बिंदू गिना जाता है।
आज लोग उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते है और अनेक ऐसे दल हैं जो उनके आदर्शों पर खुद का अस्तित्व मानते है लेकिन ये असंभव है क्यूंकि चौ: देवीलाल के आदर्श आज की मूल्य विहीन राजनीती में कहीं भी सटीक नहीं बैठते। आज किसान मजदूर ग़रीब के मुद्दे राजनितिक स्वार्थों के आगे गौण पड़ गए हैं।
आज जब देश का किसान अपना खलिहान छोड़ कर सड़कों पर बैठा है चौ: देवीलाल तो जैसे किसान की कमी महसूस होना स्वाभाविक है। आज अगर चौ: देवीलाल हमारे बीच होते तो मौजूदा हालात में अगर ये तीन कृषि कानून किसानों के हक़ में नहीं है तो सरकार को घुटनों पर ला देते और अगर इन कानूनों से किसान को कोई लाभ होता तो अब तक किसान को सम्मान सहित समझा चुके होते।
आज उनकी पुण्यतिथि पर देश के उस महान पुरोधा को शत शत नमन करते हैं।

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