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शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

कामकाज़ी महिलाओं में माहवारी के दौरान हो रहे शोषण पर सख्त कदम की जरुरत

          भारत में अन्य देशों की तुलना में हो रहा है  कामकाज़ी महिलाओं का शोषण

            माहवारी के दौरान अन्य देशों के बनाये गए कानून को लागू  करने की है जरुरत


भारत एक पुरुष प्रधान देश माना जाता रहा है,  जिसमे महिलाओं के हितों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना क़ी पुरुष के हितों पर।  लेकिन फिर भी सरकारें अपने कागज़ो में महिला सशक्तिकरण जैसे अभियान चला कर समाज और जनता में इस तरह के प्रचार'करने में सफल रही है कि  वो महिला हितेषी है, और महिलाओं को पुरुषों  के बराबर हक़ दिलवाने के लिए संघर्षरत है।  लेकिन क्या कभी इस बात को सोचने की जरुरत महसूस हुई की क्या सरकार द्वारा चलाये गए अभियान और योजनाएँ सफल रही या असफल।  क्या इन योजनाओं का वास्तविकता के धरातल पर उतना प्रभाव पड़ा जिस मकसद से ये योजना बनाई गई थी।  
क्या महिला सशक्तिकरण के विज्ञापनों पर करोड़ो खर्च देने के बावजूद आज इस देश की महिला सशक्त है या आज भी वही हाल है।

हाल ही में देश के विभिन्न हिस्सों से आई खबरें बड़ी ही दर्दनाक और हैरान कर देने वाली हैं, जिसमे दक्षिण भारत के तमिनलाडु प्रान्त में थॉमसन रूटर्स फाउंडेशन ने एक प्रतिष्ठित गारमेंट्स कम्पनी में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार को उजागर किया है, जिसमे कम्पनी के अधिकारी कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दौरान बिना किसी चिक्तिसक की अनुमति के ,बिना किसी नाम की दवाइयाँ  खिला देते थे, जिससे कि  उनकी माहवारी के दौरान उनको दर्द न हो , वो काम पर आती रहें और उनको छुट्टी न लेनी पड़े।  इस कंपनी की महिलाओं  ने बताया की इस दवाई को लेने के कुछ समय  बाद उनको कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा जिसमे दिमागी परेशानी ,तनाव , मूत्र संक्रमण और गर्भपात जैसी बिमारियां शामिल थी।  इस संगठन के लोगों ने गहरी जाँच पड़ताल में पाया कि  कंपनी के अधिकारीयों का इन महिलाओं पर बहुत तकड़ा नियंत्रण था, जिससे कि  वो शौच भी सही समय पर नहीं जा पाती  थी।

                 

हीं एक दूसरा मामला महाराष्ट्र के बीड क्षेत्र का है, जहाँ गन्ना काटने वाली महिलाओं की बच्चेदानी को बाहर निकलवा दिया जाता है।  द हिन्दू की ख़बर के मुताबिक यह कहा गया है कि  इस क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसी महिला होगी जिसने एक या दो बच्चों के बाद अपनी बच्चेदानी का ऑपरेशन न करवाया हो।  महिलाओं  से बात करने के बाद यह पता चला कि   गन्ना कटवाने वाले ठेकेदार उन्हें ऑपरेशन करवाने के लिए पैसे  उधार दे देते हैं जिसको वे मजदूरी करके चुका देती है। महिलाओं ने बताया की ठेकेदार ये नहीं चाहते की काम के दौरान उनको किसी भी वजह से कोई छुट्टी लेनी पड़े।   महिलाओं की इस तरह के ऑपेरशन के बाद दिमागी परेशानी, वजन बढ़ जाना और हार्मोन में अंसतुलन जैसी कई बीमारियों से ग्रसित भी देखा गया।  एक हिंदी अख़बार की ख़बर के मुताबिक पुरे बीड क्षेत्र में तीन साल में ४६०० महिलाओं के गर्भाशय निकाले जा चुके है, जिसकी जाँच के आदेश सरकार ने दे दिए है।
 उपरोक्त  घटनाएं  इस तरह की  वो घटनाएं है जो सामने आ गई हैं , १२५ करोड़ के देश में जहां आधी से ज्यादा आबादी गरीबी के साये में जी रही है, वहां इस तरह की सैंकड़ों हजारों घटनाएं नहीं होगी इस बात से कतई इन्कार नहीं किया जा सकता।
अगर हम दूसरे देशों की बात करें तो इन देशों में महिलाओं की माहवारी के लिए विशेष कानून बनाये गए है फिर वो चाहे राजकीय विभाग में काम कर रही हो या निजी किसी कम्पनी में।  जापान , ताइवान , दक्षिण कोरिया , रूस जैसे देशो में जहां महिलाएं पुरुषों के बराबर काम करती है वहां इस चीज़ को लेकर बड़े सख्ती से कानून बनाये हुए है जिसमे महिलाओं को माहवारी के दौरान जहाँ अवकाश का प्रावधान है वहीं अगर महिलाओं को काम पर आना भी पड़े तो उनको विशेष सुविधाएं हासिल है।
       इस कहानी का निष्कर्ष क्या है , यही कि जिस देश में हम नारी को देवी  का दर्ज़ा देते है उस देश में नारी के ये हालात हैं।  इससे अच्छा तो दुनिया के दूसरे देश है जो दिखावे में विश्वास न करके लोगों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध करवाते हैं।  सिर्फ पैडमैन जैसी फिल्में बनाने से हम ये नहीं मान सकते कि  इस तरह की समस्या से छुटकारा मिल गया है।  सच तो यह है कि  जिन लोगों के लिए इस तरह की फिल्में  बनती है उनको न तो फिल्म देखने की फुर्सत है और न ही १० रूपये वाले पॉपकॉर्न १५० रूपये में लेकर खाने का बजट।
           मेरा सरकार में शीर्ष पदों पर बैठे योजनाकारों से यही आग्रह है कि समाज की इस तरह की छुपी हुई और मार्मिक समस्याओं के लिए जहां एक तरफ विशेष कानून बनाये जाये वहीं ऐसे मामलों में लापरवाही बरतने वाले अधिकारीयों , निजी कम्पनी के मालिकों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाये।  आखिर "यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता "  का उद्घोष यूँ अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन देने से चरितार्थ नहीं होगा।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

ऊर्जा संकट से बचने के लिए अक्षय ऊर्जा एक महत्वपूर्ण विकल्प

            ऊर्जा क्षेत्र में माइक्रोग्रिड के द्वारा  उपभोक्ता को उत्पादक बनाने की जरुरत


इक्कसवीं सदी का भारत आज हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है, चाहे वो कृषि का क्षेत्र हो, उद्योगधंधे हो या व्यवसाय। लेकिन इन सभी की नींव अगर टिकी है तो वो है ऊर्जा -विद्युत् ऊर्जा या बिजली।  बिना विद्युत् ऊर्जा के  आज हम सुबह से लेकर शाम तक किसी भी क्रिया की कल्पना नहीं कर सकते।  हर पल हर कदम पर हमे विद्युत् ऊर्जा की आवश्यकता है।  लोगों ने छोटी से छोटी जरुरत के लिए विद्युत् ऊर्जा का उपयोग करना शुरू कर दिया है और यही कारण  है कि देश में पिछले कुछ सालों से लगातार विद्युत् ऊर्जा के उत्पादन में बढ़ावा करने के बाबजूद भी कहीं न कहीं ऊर्जा संकट नजर आ रहा है।  
यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2035 तक ऊर्जा की मांग 41  प्रतिशत तक और बढ़ सकती है।  विद्युत् ऊर्जा उत्पादन के जानकारों का ये मानना है कि अगर इसी तरह से विद्युत् ऊर्जा का उपयोग बढ़ता रहा तो आने वाले कुछ सालों में ऊर्जा उत्पादन का मुख्य स्रोत कोयला धरती से खत्म  हो जायेगा जिससे कि ऊर्जा के उत्पादन में जबरदस्त गिरावट आएगी। इसलिए इस भयानक समस्या से निपटने के लिए ऊर्जा के दार्शनिको ने समय रहते अक्षय ऊर्जा की और अपना रुझान करना शुरू कर दिया है। अक्षय ऊर्जा जिसमे मुख्य रूप से सौर ऊर्जा आती है वहीं जैव ऊर्जा,पवन ऊर्जा  इत्यादि भी इसी का हिस्सा है।
             अगर हम सिर्फ सौर ऊर्जा की ही बात करें तो एक वर्ष में सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा , पूरे विश्व की ऊर्जा मांग से कई गुना है,यानि कि अकेले सौर ऊर्जा से ही हम पूरे विश्व की ऊर्जा की मांग को आसानी से पूरा कर सकते है।   वहीं हमारे देश में सोलर पावर प्लांट लगाने का खर्च प्रति मेगावाट पुरे दुनिया से कम आता है। साथ ही साथ कृषि और पशुपालन से मिलने'वाले जैव पदार्थों से जैव ऊर्जा के उत्पादन की और भी विशेष ध्यान देने की जरुरत है।
आज विश्व के अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी देश आइसलैंड ,स्वीडन ,कॉस्ट रिका ,यू के ,डेनमार्क और जर्मनी जहां प्रति व्यक्ति अक्षय ऊर्जा उत्पादन विश्व में सबसे ज्यादा है , उन देशों ने किस तरह की नीतियां ऊर्जा उत्पादन में लागू की है, उसी तरह की नीतियों को हमारे देश में करने की जरुरत है।  आइसलैंड जहां 100 प्रतिशत ऊर्जा की मांग अक्षय ऊर्जा से पूरी करता है , वही कॉस्ट रिका 99 प्रतिशत ऊर्जा का भरपाई अक्षय ऊर्जा से करता है।  
           जब इन छोटे छोटे देशों ने स्वयं को ऊर्जा क्षेत्र में इतना शक्तिशाली बना रखा है तो हमारे देश में ये सब क्यों नहीं हो सकता, बस आवश्यकता है कि हम अक्षय ऊर्जा से संबधित नयी तकनीकों को हमारे देश में स्थापित करें।आज दुनिया के जो देश ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी है वहां सिर्फ सरकारें ही ऊर्जा उत्पादन के लिए जिम्मेवार नहीं बल्कि वहां के नागरिक भी इस को लेकर बड़े गंभीर है और सरकारों का पूरा योगदान दे रहे है।
                   आज हमें देश में इस तरह की योजनाएं लागू करने की जरुरत है, जिससे देश का हर परिवार अपने जरुरत के हिसाब से स्वयं ऊर्जा उत्पादन करके खुद को जहाँ ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाये वहीं जरुरत से ज्यादा उत्पादन करके सरकार को विक्रय भी करें। इससे एक तरफ जहाँ सरकारों को ऊर्जा उपलब्ध करवाने के लिए ज्यादा सोचना नहीं देना पड़ेगा वहीं यह कदम हर परिवार के लिए आमदनी का भी स्रोत बन जायेगा। दुनिया के कई देशों में इस तरह के प्रोजेक्ट चल भी रहे हैं जहां उपभोक्ता बिजली का उपयोग करने के उपरांत अतिरिक्त उत्पादन करके बिजली कंपनियों को आपूर्ति कर रहा है। उदाहरण के तौर पर किसान जहां अपनी खेत की मुंडेरों पर व ख़ाली पड़ी भूमि में सोलर ऊर्जा आधारित बिजली पैदा कर सकता है, वही वो अपनी कृषि अवशेष और पशु धन अवशेष से जैव ऊर्जा आधारित बिजली भी पैदा कर सकता है। ऊर्जा उत्पादन को आज व्यवसाय बना कर पेश करने की आवश्यकता है जिससे आम जान का इस विषय की और ध्यान केंद्रित कर सके। जिस तरह से सरकारों ने पिछले कुछ समय में पीली रोशनी को सफ़ेद रोशनी में बदलने के प्रयास किए हैं और उसमे सफलता भी पायी है, ठीक उसी तरह फिर एक अभियान चला कर हर परिवार को सौर और जैव ऊर्जा के प्रति जागरूक करके जोड़ने की आवश्यकता है। अगर निकट भविष्य में इस तरह की योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाता है तो  योजनाकारों का यह कदम देश में ऊर्जा क्रांति लाने का काम करेगा। 

  आने वाले समय में जिस तरह से पारम्परिक ऊर्जा उत्पादन के संसाधनों में कमी का अंदेशा है,उससे निपटने के लिए अक्षय ऊर्जा एक बेहतर विकल्प हो सकता है। हमारे देश में जहां सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अनेक संभावनाएं हैं वहीं  कृषि प्रधान देश होने के चलते  जैव ऊर्जा में भी अनेक संभावनाएं तलाशी जा सकती है। निष्कर्ष में यहीं कह सकते हैं की ऊर्जा संकट से बचने के लिए अक्षय ऊर्जा के उत्पादन में जहां और अधिक लाभकारी और प्रभावशाली नीतियां बनाने की जरुरत है वहीं मौजूदा समय में चल रही योजनाओं को वास्तविकता के धरातल पर उतारने की भी आवश्यकता है।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

किसान नेता टिकैत केजरीवाल बनते हैं या बाबा रामदेव

दिल्ली की सीमाओं पर पिछले करीबन तीन महीने से बैठे हुए देश भर के किसानों द्वारा, केंद्र सरकार द्वारा लागू किये गए तीन कृषि बिलों के ख़िलाफ़ आंदोलन जारी है।  इस आंदोलन को लेकर सरकार और किसान नेताओं के बीच क़रीबन दस बार वार्तालाप हुआ लेकिन कोई भी पक्ष अपने आप को झुकाने को तैयार नहीं हुआ।  जहां किसान नेता इन बिलों को रद्द करवाने को लेकर अड़े रहे वहीं सरकार इन बिलों में सशोधन की बात करती रही।  

इन कानूनों को लेकर किसान नेताओं ने गत २६ जनवरी को दिल्ली में ट्रेक्टर रैली निकाली थी जोकि बाद में एक विरोध प्रदर्शन में बदल गई और लाल किले व आश्रम तथा आई टी ओ सहित कई क्षेत्रों में काफी उपद्रव हुआ जिसमे लाल किले पर झंडा लहराने को लेकर कई लोगों पर केश दर्ज़ भी हुआ और सरकार की तरफ से कार्रवाई भी की गई। 

इस किसान आंदोलन में मुख्य रूप से पंजाब सूबे की किसान यूनियन थी और ज्यादातर किसान भी पंजाब के ही थे लेकिन २६ जनवरी के घटनाक्रम के बाद सरकार ने पंजाब के किसान नेताओं को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया और आंदोलन में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के किसान नेता राकेश टिक्कैत को आगू बना दिया।  राकेश टिक्कैत को गिरफ्तार करने के लिए काफी मात्रा में सुरक्षा बल को भेजने का नाटक भी किया गया और राकेश टिकैत के आंसू तक निकल आये ।  

अब पिछले कुछ दिनों से राकेश टिकैत इस आंदोलन के मुख्या नज़र आ रहे है हालांकि पंजाब के किसान नेता अभी भी डटे हुए है और किसान भी कम नहीं हुए है लेकिन टिकैत पुरे देश में घूम घूम कर बड़े बड़े राजनीतिक मंच साँझा करके रैलियां कर रहे है।  

इससे सवाल ये उठता है कि क्या इस आंदोलन से राकेश'टिकैत आने वाले समय में अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहे हैं या सरकार अनौपचारिक तरीके से राकेश टिकैत को हवा दे रही है क्युकिं हो सकता है कि सरकार के थिंक टैंक को ऐसे लगता हो कि टिकैत भविष्य में उनकी डूबते हुए को तिनके का सहारा बन सकते है।  

ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा कि टिकैत केजरीवाल बनते हैं या बाबा रामदेव लेकिन ये कहा जा सकता है कि इस किसान आंदोलन को सरकार ने राकेश टिकैत की और ध्रुवीकरण कर दिया है।  


मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

मानसिक अवसाद आज की समस्या


मौजूदा समय में मानव जाति के सामने अनेक परेशानियां सुरसा के मुंह की तरह मुंह बांए खङी है। आज हर मनुष्य किसी न किसी वजह से मानसिक अवसाद से ग्रस्त हो चुका है । हर दिन बिगङते रिश्ते खत्म हो रहा व्यापार व सिमटता हुआ काम धंधा मानसिक अवसाद के मुख्य कारण है वहीं किशोरों में उनकी पढाई को लेकर हो रही देरी तथा सफलता पाने का ईंतजार उनको मानसिक अवसाद की और ले जा रहा है। पर हमें हर हाल में इस अवसाद से ऊपर उठना है और अपने रिश्तों को व स्वयं को बचाना है। समय की कठिनता से उपजा यह रोग कोई दीर्घकालीन नहीं है पर हमारे रिश्ते जन्म जन्मों के है जिनके बिना जीवन जीना मुश्किल है।आज आत्महत्या करने जैसी अनेक खबरें सुनने में आई है जो सिर्फ और सिर्फ इस समय की ही देन है। संकट के इस समय में कुछ ऐसी बातें है जिनके द्वारा हम कुछ हद तक अवसाद से छुटकारा पा सकते हैं।

  1. अपने परिवार का कोई सदस्य यदि असामान्य व्यवहार कर रहा है तो उसे पहचाने और उससे बात करने की कोशिश करें जिससे वो अपनी परेशानी बयां कर सकें 
  2. यदि कोई सदस्य बात बात पर गुस्सा हो रहा है तो उससे भी बात करके उसके अंदर की परेशानी को जानने की चेष्टा करें।
  3. याद रखें केवल हम अपने सदस्य की समस्या का समाधान कर सकते हैं कोई डॉक्टर नहीं।
  4. ज्यादा समस्या दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह ले और एक बार ईलाज शुरू करवाएं।
  5. ज्यादा से ज्यादा योग ध्यान और अपने ईष्ट के नजदीक रहने की कोशिश करें,याद रखें अध्यात्मिक बल बहुत शक्तिशाली होता है।
  6. हो सके तो थोङा बाहर घूमने की कोशिश करे और प्रकृति के नजदीक जाएं।यह बङा सुकून देती है।
  7. जो अपने मनपंसद काम है वो करने का प्रयास करें जैसे कि कोई खेल जिसमें आपकी रूचि हो या कोई ऐसा काम जो आपको सुकून देता हो।
  8. फालतू की अफवाह से बचें ।

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

तंबाकू - एक जानलेवा लत


तंबाकू कितने समय से मानव जाति की साँसे छीन रहा है , इसका कोई पक्का प्रमाण तो नहीं है पर ऐसा कहा जाता है कि लगभग 8000 वर्ष पहले अमेरिका के जंगल में  तम्बाकू पहली बार पहचाना गया  था।  लगभग 2,000 साल पहले तंबाकू को सांस्कृतिक या धार्मिक समारोहों और आयोजनों के दौरान चबाया और धूम्रपान किया जाने लगा।
उस समय मानव जाति शायद जानती नहीं थी कि ये परम्परा एक  दिन जानलेवा लत बन जाएगी ।मौजूदा हालात में तंबाकू का उपयोग दुनिया भर में महामारी के अनुपात तक पहुँच गया है और धूम्रपान की प्रवृत्ति को उलटने के प्रयासों के बावजूद, समस्या केवल प्रत्येक वर्ष बड़ी होती जा रही है।
प्रत्येक वर्ष दुनिया भर में लगभग 6.5 ट्रिलियन सिगरेट बेची जाती हैं, जो प्रति दिन लगभग 18 बिलियन सिगरेट का अनुवाद करती है। वहीं अन्य तरीकों से तम्बाकू सेवन करने वालों का आंकड़ा भी करोड़ो में है। 
यह भी सुनने  में आया है कि दुनिया में अनुमानित एक बिलियन धूम्रपान करने वालों में से 80% निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं।
चीन, भारत और ब्राजील आज तीन सबसे बड़े तंबाकू उत्पादक देश हैं। आश्चर्य की बात है कि इन देशों  में धूम्रपान को लेकर जागरूकता निम्नतम स्तर पर है। 
तम्बाकू आज सभी धूम्रपान करने वालों में से लगभग आधी जनसंख्या को मौत के घाट उतार देता है ।
वैश्विक स्तर पर, तंबाकू से प्रति वर्ष छह मिलियन लोगों की मृत्यु होती है तथा हर पांच सेकंड में एक मौत होती है।
मरने वालों की कुल संख्या में से 600,000 धूम्रपान न करने वालों में से हैं, जो सेकेंड हैंड (लोगों के द्वारा छोड़े गए ) धुएं के संपर्क में थे। और 2030 तक अगर यह प्रवृत्ति जारी रही तो मरने वालों की संख्या बढ़कर आठ मिलियन हो जाएगी।
अमेरिका में हर पांच में से एक मौत का सीधा कारण धूम्रपान है, जो सालाना लगभग 480,000 मौतों, प्रति दिन 1,300 धूम्रपान से संबंधित मौतों, प्रति घंटे 54 मौतों या प्रति मिनट लगभग एक मौत का अनुवाद करता है।
आप जो भी सिगरेट पीते हैं, वह आपके जीवन से 5  से 11 मिनट कम करती  है। जीवन भर में, जो आपकी जीवन प्रत्याशा को 12 वर्ष तक कम कर सकता है।
हृदय रोग से होने वाली मौतों में से लगभग 25% और फेफड़ों की बीमारी से होने वाली मौतों में से 75% किसी भी अन्य कारण के बावजूद धूम्रपान के लिए सीधे जिम्मेदार हैं।



तो क्या ये कभी नहीं थमेगा , क्या इस लत के कारण यूँ ही लोग बेमौत मरते रहेंगे , शायद इसका कोई जवाब नहीं पर भारत के एक कोने से कुछ वीरांगनाएँ मन बना चुकी थी कि इस अभिशाप को मिटा के ही दम लेंगी। 
समय समय पर अनेक समाजसेवी संस्थाएं एन जी ओ तथा सरकारें तम्बाकू को रोकने का अभियान चला रही है पर समस्या जस की तस बनी हुई है। 
तम्बाकू उत्पादों से लगातार हो रहे स्वास्थय हानि पर अब हमें जाग जाने की जरूरत है। 




उत्तरी भारत की आस्था का केन्द्र बागड़ का गोगामेड़ी धाम


उत्तरी भारत की आस्था का केन्द्र बागड़ का  गोगामेड़ी  धाम 


भारत वर्ष में अनेक धर्मों सम्प्रदायों मजहबों के लोग रहते हैं और अलग अलग देवी देवताओं पीर पैगंबरो में अपनी मान्यतायें रखते हैं। उत्तर भारत में ऐसे ही लोकदेवता के रूप में विख्यात है जाहरवीर गोगा जी महाराज। 
 ऐसी ही एक आस्था का केंद्र है बागड़ का गोगामेड़ी धाम जो राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले की नोहर तहसील में आता है।  यहां जाहरवीर गोगा जी की समाधि बनी हुई है और गोगा जी के गुरु श्री गोरखनाथ जी का भी मंदिर बना हुआ है।  धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गोगा जी सापों के देवता है और उनकी पूजा अर्चना से नागदेवता प्रसन्न हो जाते है।  गोगाजी को जहां हिन्दू धर्म में गोगा वीर मान कर पूजते हैं, वहीं मुस्लिम पीर मान कर इनकी समाध पर माथा टेकते हैं। गोगा जी का जन्म विक्रमी सम्वत 1003 में  चूरू में ददरेवा गांव में हुआ वहीं उनकी समाधि हनुमानगढ़ के मेड़ी में बनी हुई है।  गोगा जी का यह धाम दिल्ली से  करीबन 300  किमी दूर है और जयपुर से करीबन 400 किमी दूर है।
गोगामेड़ी धाम के लिए जयपुर , नई दिल्ली आदि प्रमुख स्टेशनो से रैल यातायात के द्वारा भी हम जा सकते हैं। 
 यह उत्तर भारत के सात राज्यों के श्रद्धालु हिन्दू मास भाद्रपद (भादवा ) में एक महीने तक शीश झुकाते है। 
गोगामेड़ी धाम में जहां लाखों की संख्या में लोग माथा टेकते है वहीं यहां पशुओं का विशाल मेला लगता है जिसमे मुख्यत: ऊँट और बैल की ख़रीद बेच होती है और समस्त उत्तर भारत के व्यापारी अपनी पशुओं की ख़रीद बेच करने यहां आते है।  गोगा मेडी धाम में प्रसाद के तौर पर मुख्यत नारियल चढ़ाया जाता है वही यहां का घेवर जिसे लोकल भाषा में खजला भी कहते है बहुत प्रसिद्ध है और स्वादिष्ट भी है।


गोगाजी के गुरु गोरखनाथ जी का टीला गोगामेड़ी  से 2 किमी दूरी पर है जहाँ एक तरफ उनका मठ बना हुआ है वही दूसरी तरफ़ एक सरोवर बना हुआ है  जिसमें सभी श्रद्धालु डुबकी लगा कर जाते है।  मान्यता यह भी है कि इस सरोवर में स्नान करने से  तन मन के सभी दोष ख़त्म हो जाते हैं।  लोक मान्यता यह भी कि सर्प दंश से पीड़ित व्यक्ति को अगर गोगा मेडी धाम तक लाया जाये तो उसका सर्प दंश समाप्त हो जाता है।      

 गोगा जी का ये पर्व एक महीने तक चलता है जिसे भगतगण बागड़ यात्रा के नाम से भी जानते है।   पूरे भादवा महीने में चलने वाला गोगा जी महाराज का यह मेला हिन्दू मुस्लिम एकता का जीवंत उदाहरण है जहां हिन्दू और मुस्लिम बिना किसी मजहबी भेदभाव के गोगा जी की समाधि पर माथा टेकते है।