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बुधवार, 7 अप्रैल 2021

सुकमा हमले के बाद कई तरह के सवाल है देश के जहन में

 हमें तो अपने ने लूटा, गैरों में कहा दम था 


आजादी के बाद भारत में अनेक तरह की समस्यायें सताती रही है जिनमे गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं मुख्यत: है, साथ ही साथ पडोसी देशों से सीमा पार  आतंकवाद भी एक मुख्य चुनौती रहा है। जहां हमें बाहरी दुश्मनों से सदैव सचेत रहने की आवश्यकता रही है, वहीं देश के अंदर की देशद्रोही शक्तियां भी उतनी ही हावी रही है जिसमें  दिनोदिन पनपता नक्सलवाद सबसे बड़ी चुनौती है। एक प्रतिष्ठित अख़बार की रिपोर्ट  मुताबिक नक्सलवाद ने पिछले दो दशक में 2700 जवानों की शहादत के साथ 12000 लोगों की जान को नुकसान पहुंचाया है।  

ताज़ा हालातों को देखें तो गत तीन अप्रैल को हुए नक्सलवादी हमले में हमारे 25 जवान शहीद हुए हैं , वही उतनी ही तादात में घायल हुए हैं । ये कोई नया मामला नहीं है, पहले भी इस तरह के बड़े हमले होते रहे है जिसमे अप्रैल   2010 में हुए हमले में हमने 76 जाबांज सिपाहियों  को खोया है।  

आज सुचना प्रद्योगिकी का युग है , समय बदल चूका है और देश का आम नागरिक बेरोज़गारी की मार के चलते सोशल मीडिया पर अपना टाइम खपा रहा है और हर छोटी से छोटी गतिविधि से वाकिफ है। 

इस हमले के बाद कई तरह की चीज़ें सामने आयी है, जिससे सीधा सीधा निशाना केंद्र सरकार को बनाया जा रहा है।  सबसे पहले एक न्यूज़ चैनल पर देश के बड़े चुनावी एनालिसिस्ट प्रशांत किशोर का एक इंटरव्यू दिखाया जा रहा है, जिसमे वो कह रहे है कि अगर देश में कोई बड़ा सैन्य हमला होता है तो उसका सीधा फायदा बीजेपी को बंगाल-असम चुनाव में मिलेगा।  अब कैसे मिलेगा ये प्रशांत किशोर की ही समझ है, लेकिन जनता है सब जानती है। बार बार चुनाव से पहले सैन्य हमले होना किस बात का संकेत है। क्या हमने दूध की रखवाली बिल्ली को दे रखी है, यह बड़ा सवाल है।  

दूसरा एक हिंदी समाचार पत्र में एक वरिष्ठ पत्रकार जोकि आंतरिक सुरक्षा की खबरें देखते है, उनके अनुसार इस हमले में पैरामिल्ट्री फाॅर्स के वरिष्ठ अधिकारी वहां मौजूद थे और इसकी भनक नक्सलियों को थी जिससे वे चौकन्ने हुए और अपनी रणनीति बनाने में कामयाब हुए,उनके मुताबिक वरिष्ठ अधिकारीयों के मौके पर होने से  जवानों को धरातल पर अंडर प्रेशर काम करना पड़ता है और वो अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाते। जो काम दिल्ली में रह के किया जा सकता है उसके लिए वहां जाने की जरूरत नहीं  है। इसी लेख में यह  भी  लिखा गया है कि जवानों के  शव 24 घंटो तक घटनास्थल पर पड़े रहे , अगर मौके पर ही सुध ली जाती तो जवानों  को बचाया भी जा सकता था।  उन्होंने मीडिया को सिर्फ 5 जवानों की शहादत की ख़बर चलाने के लिए भी काफी डांटा है।  उनके मुताबिक  साल 2010  में हुए नक्सली हमले की जाँच में पाया गया कि फाॅर्स कि एक वायरलेस वॉकी -टॉकी  उपकरण नक्सलियों के पास था जिससे उनको सेना के हर मोमेंट की जानकारी थी। इस बार भी एक राजनीतिक दल के जिला उपाध्यक्ष  सामने आया है की उसने नक्सलियों को ट्रेक्टर उपलब्ध करवाया था। यह बात सर्वमान्य सिद्ध होती है कि बिना विभीषण के लंका नहीं जीती जाती, इसको हमसे बेहतर कोई नहीं सकता। 

इसके अलावा पैरामिल्ट्री फाॅर्स में आईपीएस लॉबी की कप्तानी को लेकर भी सेना के लोगों ने सवाल खड़े किये है।  इसमें ये कहा गया है कि पैरामिल्ट्री फोर्सेस की अगुवाई के लिए आईपीएस योग्य नहीं है,  इनकी अगुवाई इन्ही फोर्सेस के सीनियर ओफिसर्स से करवानी चाहिए जिसको वहाँ के जमीनी और वास्तविक हालातों का पता हो।  

सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में घायल जवानों को ट्रैक्टर पर लाद कर ले जाते हुए दिखाया गया है और इसकी तुलना में पीएम को जोड़ कर भी बताया गया है, इस वीडियो की कितनी सच्चाई है  इसका वास्तविक ज्ञान मुझे नहीं है पर अगर ऐसा हो रहा है तो देश में राफेल की  नहीं, जवानो के लिए सुविधाएं की जरुरत  है।  

खैर ये सब चीज़ें उस देश के अंदर घटित हो रही है जो विश्वगुरु बनने की सोच रहा है और विश्व के मानचित्र पर अपनी सैन्य शक्ति को शीर्ष पर लाने की सोच रहा है। रक्षा बजट को लेकर संसद में सरकारें अपनी पीठ थपथपाती हैं। देश लगातार अपनी सीमाओं को मजबूत करने में लगा हुआ है, लेकिन अपना घर सुरक्षित नहीं है। आज जिस तरह के फैसले सरकार ले रही है, और जिस देश में अजित डोभाल जैसे सुरक्षा सलाहकार है और अमित शाह जैसे गृह मंत्री है, उस देश में जवानों को किसी बाहरी दुश्मन का खतरा नहीं है बल्कि अपने ही घर के लोग उनको मारे जा रहे है।  यहां डोभाल जैसे अधिकारीयों की रणनीति कहाँ चल जाती है यह समझ के दायरे से बाहर है।  

आजादी के 75 साल के बाद भी हम अपने देश के नागरिकों को ये भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं कि सरकार उनके साथ है और विकास में उनकी भागीदारी भी जरुरी है, दुर्भाग्यपूर्ण है।  जहां चाय पर चर्चा, परीक्षा पर चर्चा हो सकती है वह जवानों के शहादत पर और देश के आंतरिक हालातों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है।  दूसरा आम नागरिकों  और जवानों के परिजनों ने बार बार इस मुद्दे को भी उठाया है कि सिर्फ बॉर्डर पर शहीद होने वाले जवानों को ही शहादत का दर्ज़ा क्यों , बाकि के जवानों को क्यों नहीं। क्या देश के अंदर दी हुई शहादत नकली है ? अगर इस नीति में बदलाव नहीं हुआ तो भविष्य में कौन अपने परिवार को संकट में डाल कर अपने भाई और बेटे को सेना में भेजेगा, देश के शीर्ष पदों पर बैठे लोग यहां क्यूँ आंखें मूँद लेते है।  

बार बार हो रहे हमलों के बाद सिर्फ श्रद्धांजलि का ढोंग कर के देश की आवाम को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। अब जरूरत है कि देश के अंदर पनप रहे इस तरह कि समस्याओं से निपटा जाये और इनकी वास्तविक जड़ों को खोदा जाये, जिससे कि जवानों का खून बार बार देश की मिटटी को रक्तरंजित न करें।   

निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि आज देश में सभी नागरिकों की विकास में भागीदारी नहीं है , सरकारें अपने देश वासियों का विश्वास कायम करने में विफल रही है। जवानों के साथ भेदभाव वाली नीतियां है, देश का गृह मंत्रालय और उनकी इंटेलिजेंस में तथा पैरामिल्ट्री फोर्सेज के एडमिनिस्ट्रेटिव सेट अप में अभी भी खामियाँ है।  राजनीतिक फायदे के लिए अगर इस तरह के घटनाक्रम हो रहे है तो इससे बड़ा देश का दुर्भाग्य नहीं है।  

इस तरह की घटनायें सीमापार हो रहे आतंकवाद से ज्यादा दर्द देती है क्युकिं अपनों के द्वारा दिए गए जख्म ज्यादा दुखते हैं चाहे वो कश्मीरी किशोरों के द्वारा फेंके गए पत्थर हो या फिर नक्सलियों के द्वारा किया गया आघात। बार बार देश के अंदर देश के जवानो पर हो रहे जुल्म पर यह कह सकते है कि "हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था"। 









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