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बुधवार, 7 अप्रैल 2021

सुकमा हमले के बाद कई तरह के सवाल है देश के जहन में

 हमें तो अपने ने लूटा, गैरों में कहा दम था 


आजादी के बाद भारत में अनेक तरह की समस्यायें सताती रही है जिनमे गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं मुख्यत: है, साथ ही साथ पडोसी देशों से सीमा पार  आतंकवाद भी एक मुख्य चुनौती रहा है। जहां हमें बाहरी दुश्मनों से सदैव सचेत रहने की आवश्यकता रही है, वहीं देश के अंदर की देशद्रोही शक्तियां भी उतनी ही हावी रही है जिसमें  दिनोदिन पनपता नक्सलवाद सबसे बड़ी चुनौती है। एक प्रतिष्ठित अख़बार की रिपोर्ट  मुताबिक नक्सलवाद ने पिछले दो दशक में 2700 जवानों की शहादत के साथ 12000 लोगों की जान को नुकसान पहुंचाया है।  

ताज़ा हालातों को देखें तो गत तीन अप्रैल को हुए नक्सलवादी हमले में हमारे 25 जवान शहीद हुए हैं , वही उतनी ही तादात में घायल हुए हैं । ये कोई नया मामला नहीं है, पहले भी इस तरह के बड़े हमले होते रहे है जिसमे अप्रैल   2010 में हुए हमले में हमने 76 जाबांज सिपाहियों  को खोया है।  

आज सुचना प्रद्योगिकी का युग है , समय बदल चूका है और देश का आम नागरिक बेरोज़गारी की मार के चलते सोशल मीडिया पर अपना टाइम खपा रहा है और हर छोटी से छोटी गतिविधि से वाकिफ है। 

इस हमले के बाद कई तरह की चीज़ें सामने आयी है, जिससे सीधा सीधा निशाना केंद्र सरकार को बनाया जा रहा है।  सबसे पहले एक न्यूज़ चैनल पर देश के बड़े चुनावी एनालिसिस्ट प्रशांत किशोर का एक इंटरव्यू दिखाया जा रहा है, जिसमे वो कह रहे है कि अगर देश में कोई बड़ा सैन्य हमला होता है तो उसका सीधा फायदा बीजेपी को बंगाल-असम चुनाव में मिलेगा।  अब कैसे मिलेगा ये प्रशांत किशोर की ही समझ है, लेकिन जनता है सब जानती है। बार बार चुनाव से पहले सैन्य हमले होना किस बात का संकेत है। क्या हमने दूध की रखवाली बिल्ली को दे रखी है, यह बड़ा सवाल है।  

दूसरा एक हिंदी समाचार पत्र में एक वरिष्ठ पत्रकार जोकि आंतरिक सुरक्षा की खबरें देखते है, उनके अनुसार इस हमले में पैरामिल्ट्री फाॅर्स के वरिष्ठ अधिकारी वहां मौजूद थे और इसकी भनक नक्सलियों को थी जिससे वे चौकन्ने हुए और अपनी रणनीति बनाने में कामयाब हुए,उनके मुताबिक वरिष्ठ अधिकारीयों के मौके पर होने से  जवानों को धरातल पर अंडर प्रेशर काम करना पड़ता है और वो अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाते। जो काम दिल्ली में रह के किया जा सकता है उसके लिए वहां जाने की जरूरत नहीं  है। इसी लेख में यह  भी  लिखा गया है कि जवानों के  शव 24 घंटो तक घटनास्थल पर पड़े रहे , अगर मौके पर ही सुध ली जाती तो जवानों  को बचाया भी जा सकता था।  उन्होंने मीडिया को सिर्फ 5 जवानों की शहादत की ख़बर चलाने के लिए भी काफी डांटा है।  उनके मुताबिक  साल 2010  में हुए नक्सली हमले की जाँच में पाया गया कि फाॅर्स कि एक वायरलेस वॉकी -टॉकी  उपकरण नक्सलियों के पास था जिससे उनको सेना के हर मोमेंट की जानकारी थी। इस बार भी एक राजनीतिक दल के जिला उपाध्यक्ष  सामने आया है की उसने नक्सलियों को ट्रेक्टर उपलब्ध करवाया था। यह बात सर्वमान्य सिद्ध होती है कि बिना विभीषण के लंका नहीं जीती जाती, इसको हमसे बेहतर कोई नहीं सकता। 

इसके अलावा पैरामिल्ट्री फाॅर्स में आईपीएस लॉबी की कप्तानी को लेकर भी सेना के लोगों ने सवाल खड़े किये है।  इसमें ये कहा गया है कि पैरामिल्ट्री फोर्सेस की अगुवाई के लिए आईपीएस योग्य नहीं है,  इनकी अगुवाई इन्ही फोर्सेस के सीनियर ओफिसर्स से करवानी चाहिए जिसको वहाँ के जमीनी और वास्तविक हालातों का पता हो।  

सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में घायल जवानों को ट्रैक्टर पर लाद कर ले जाते हुए दिखाया गया है और इसकी तुलना में पीएम को जोड़ कर भी बताया गया है, इस वीडियो की कितनी सच्चाई है  इसका वास्तविक ज्ञान मुझे नहीं है पर अगर ऐसा हो रहा है तो देश में राफेल की  नहीं, जवानो के लिए सुविधाएं की जरुरत  है।  

खैर ये सब चीज़ें उस देश के अंदर घटित हो रही है जो विश्वगुरु बनने की सोच रहा है और विश्व के मानचित्र पर अपनी सैन्य शक्ति को शीर्ष पर लाने की सोच रहा है। रक्षा बजट को लेकर संसद में सरकारें अपनी पीठ थपथपाती हैं। देश लगातार अपनी सीमाओं को मजबूत करने में लगा हुआ है, लेकिन अपना घर सुरक्षित नहीं है। आज जिस तरह के फैसले सरकार ले रही है, और जिस देश में अजित डोभाल जैसे सुरक्षा सलाहकार है और अमित शाह जैसे गृह मंत्री है, उस देश में जवानों को किसी बाहरी दुश्मन का खतरा नहीं है बल्कि अपने ही घर के लोग उनको मारे जा रहे है।  यहां डोभाल जैसे अधिकारीयों की रणनीति कहाँ चल जाती है यह समझ के दायरे से बाहर है।  

आजादी के 75 साल के बाद भी हम अपने देश के नागरिकों को ये भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं कि सरकार उनके साथ है और विकास में उनकी भागीदारी भी जरुरी है, दुर्भाग्यपूर्ण है।  जहां चाय पर चर्चा, परीक्षा पर चर्चा हो सकती है वह जवानों के शहादत पर और देश के आंतरिक हालातों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है।  दूसरा आम नागरिकों  और जवानों के परिजनों ने बार बार इस मुद्दे को भी उठाया है कि सिर्फ बॉर्डर पर शहीद होने वाले जवानों को ही शहादत का दर्ज़ा क्यों , बाकि के जवानों को क्यों नहीं। क्या देश के अंदर दी हुई शहादत नकली है ? अगर इस नीति में बदलाव नहीं हुआ तो भविष्य में कौन अपने परिवार को संकट में डाल कर अपने भाई और बेटे को सेना में भेजेगा, देश के शीर्ष पदों पर बैठे लोग यहां क्यूँ आंखें मूँद लेते है।  

बार बार हो रहे हमलों के बाद सिर्फ श्रद्धांजलि का ढोंग कर के देश की आवाम को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। अब जरूरत है कि देश के अंदर पनप रहे इस तरह कि समस्याओं से निपटा जाये और इनकी वास्तविक जड़ों को खोदा जाये, जिससे कि जवानों का खून बार बार देश की मिटटी को रक्तरंजित न करें।   

निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि आज देश में सभी नागरिकों की विकास में भागीदारी नहीं है , सरकारें अपने देश वासियों का विश्वास कायम करने में विफल रही है। जवानों के साथ भेदभाव वाली नीतियां है, देश का गृह मंत्रालय और उनकी इंटेलिजेंस में तथा पैरामिल्ट्री फोर्सेज के एडमिनिस्ट्रेटिव सेट अप में अभी भी खामियाँ है।  राजनीतिक फायदे के लिए अगर इस तरह के घटनाक्रम हो रहे है तो इससे बड़ा देश का दुर्भाग्य नहीं है।  

इस तरह की घटनायें सीमापार हो रहे आतंकवाद से ज्यादा दर्द देती है क्युकिं अपनों के द्वारा दिए गए जख्म ज्यादा दुखते हैं चाहे वो कश्मीरी किशोरों के द्वारा फेंके गए पत्थर हो या फिर नक्सलियों के द्वारा किया गया आघात। बार बार देश के अंदर देश के जवानो पर हो रहे जुल्म पर यह कह सकते है कि "हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था"। 









मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

जननायक चौ: देवीलाल की कमी महसूस कर रहा है देश का किसान

किसान मसीहा जननायक चौ: देवीलाल की पुण्यतिथि पर विशेष  



एक समय था जब राजनीती जनसेवा का माध्यम थी, सफ़ेद धोती कुर्ते पहने एक साधारण सा शख्स सहसा किसी भी चौक चौराहे में हुक्का गुड़गुड़ाने बैठ जाता था , किसी भी किसान के खेत में उसकी फसल का हाल चाल जानने हेलीकॉप्टर तक उतार देता था , वो जहां भी जाता लोग उस पर विश्वास कर लेते थे , उसके लिए खुद की कोई पैठ सीट या कोई गृहजिला या कोई गढ़ नहीं था वो व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ने जहां कहां से भी चुनाव लड़ कर जीत जाने का मादा रखता था , वो जब दिल्ली कूच करता था तो देश की जनपथिया राजनीती में हलचल होने लग जाती थी ,वो संघर्ष करने का, त्याग करने का आज के राजनेताओं की तरह दिखावा नहीं करता था , उसके जीवन में कोई छुपा हुआ रहस्य नहीं था , एक ऐसा इंसान जिसने अपनी जिंदगी के आठ दशक एक संघर्ष  में बिता दिए जिसमे हर हाथ को काम और हर मुँह को रोटी देने की बात कही गई थी , वो एक असाधारण व्यक्तित्व का धनी था जिसको लोग प्यार से ताऊ कहते थे , लोकराज को लोकलाज़ से चलाने वाला वो जननायक चौधरी देवीलाल थे।   

चौ: देवीलाल की हर रणनीति में किसान और गरीब के भले की बात थी।  उन्होंने कभी मूल्यविहीन राजनीती नहीं की और न ही कहीं सत्ता प्राप्ति के लिए अनैतिक विचारधारा पर चलते हुए कोई समझौता किया।  शायद यही कारण रहे होंगे कि लोगों ने उन्हें देश के उस मुकाम पर ला कर खड़ा कर दिया जहां व्यक्ति के मुख से निकला हुआ मात्र एक शब्द किसी को राजा बना सकता था।  

चौ: देवीलाल को सत्ता में रहने का अवसर कम मिला या यूँ भी कह सकते है कि कई  बार उन्होंने स्वयं सत्ता में रहते हुए सत्ता धारियों का विरोध किया।  जब जब सत्ता ने गरीब कमेरे और किसान को लूटने के लिए नीतियां बनाई उन्होंने सत्तासीनों का न सिर्फ विरोध किया बल्कि बड़े से बड़े फैसले भी वापिस लेने का काम करवाया।  चौ: साहब जब स्वयं सत्ता में आये तो उन्होंने राजनीती को एक नई दिशा देने का काम किया और ऐसे ऐसे फैसले लिए जो किसी भी राजनेता के सोचने के दायरे से भी बाहर  थे।  वृद्धा पेंशन उन्ही एक फैसलों में से एक है जो आज चुनाव और घोषणापत्र का मुख्य बिंदू गिना जाता है।  

आज लोग उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते है और अनेक ऐसे दल हैं जो उनके आदर्शों पर खुद  का अस्तित्व मानते है लेकिन ये असंभव है क्यूंकि  चौ: देवीलाल के आदर्श आज की मूल्य विहीन राजनीती में कहीं भी सटीक नहीं बैठते। आज किसान मजदूर  ग़रीब के मुद्दे राजनितिक स्वार्थों के आगे गौण पड़ गए हैं।  

आज जब देश का किसान अपना खलिहान छोड़ कर सड़कों पर बैठा है चौ: देवीलाल तो जैसे किसान की कमी महसूस  होना स्वाभाविक है।  आज अगर चौ: देवीलाल हमारे बीच होते तो मौजूदा हालात में अगर ये तीन कृषि कानून किसानों के हक़ में नहीं है  तो सरकार को घुटनों पर ला देते और अगर इन कानूनों से किसान को कोई लाभ होता तो अब तक किसान को सम्मान सहित समझा चुके होते।  

आज उनकी पुण्यतिथि पर देश के उस महान पुरोधा को शत शत नमन करते हैं।  



रविवार, 28 मार्च 2021

अंतर-जातीय जोड़ों की सुरक्षा के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया

 
दिल्ली सरकार ने उत्पीड़न और धमकियों से अंतर-विश्वास और अंतर-जातीय जोड़ों की सुरक्षा के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SoP) जारी की है, ऐसे मामलों को देखने के लिए पुलिस उपायुक्तों की अध्यक्षता में 'विशेष प्रकोष्ठों' की स्थापना का निर्देश दिया है। एसओपी के अनुसार, सरकार अपने 'सुरक्षित घर' में उन दंपतियों को आवास मुहैया कराएगी जिनके रिश्ते का उनके परिवारों या स्थानीय समुदाय या खापों द्वारा विरोध किया जा रहा है।2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को पुलिस अधीक्षक और जिला समाज कल्याण अधिकारियों सहित हर जिले में विशेष सेल बनाने का निर्देश दिया था। समाज कल्याण विभाग ने इस महीने की शुरुआत में प्रक्रिया को सार्वजनिक किया।
 DCPs पूरे तथ्यों को जिला मजिस्ट्रेट के संज्ञान में लाएंगे और जोड़े को ‘सुरक्षित घर’ में रहने की आवश्यकता से अवगत कराएंगे यदि तथ्य सामने आते हैं और संकट में दंपत्ति को उसी की आवश्यकता होती है। युगल को पीएसओ (सुरक्षात्मक सेवा अधिकारी) के रूप में पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाएगी और क्षेत्र के डीसीपी द्वारा सुरक्षित घर भी सुरक्षित किया जाएगा। दंपति को उनके लिए खतरे के बारे में जानकारी दी जाएगी और जब तक यह समस्या हल नहीं हो जाती, तब तक उन्हें उजागर नहीं किया जाएगा।
 
एसओपी बताता है वर्तमान में, किंग्सवे कैंप में एक सुरक्षित घर स्थापित किया गया है, जो दो कमरों, एक शौचालय और रसोई के साथ 60 वर्ग गज के क्षेत्र में फैला है। यह तीन जोड़ों को समायोजित कर सकता है "जिनके संबंध उनके परिवारों या स्थानीय समुदाय और खापों द्वारा विरोध किया गया है"। उसी स्थान पर एक और सुरक्षित घर स्थापित किया जा रहा है। हालांकि, जोड़ों को सुरक्षित घरों में रहना अनिवार्य नहीं है। "अगर दंपति ऐसे सुरक्षित घरों में नहीं रहना चाहते हैं, तो विशेष प्रकोष्ठ उन्हें खतरे की धारणा के अनुसार, रहने की जगह पर उन्हें सुरक्षा प्रदान करेगा," ।
 
शीर्ष अदालत ने 2018 में एनजीओ शक्ति वाहिनी द्वारा "ऑनर किलिंग" के खिलाफ याचिका दायर करने के बाद अंतरजातीय या अंतरजातीय विवाह को चुनने वाले जोड़ों की रक्षा करने का आदेश पारित किया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्यों से ऐसे जोड़ों के लिए सुरक्षित घरों के निर्माण पर गौर करने को कहा था। 181 हेल्पलाइन के साथ काम करने वाले टेलीकॉलर्स को एसओपी का पालन करना होगा और कॉल करने वालों को उन तरीकों के बारे में सूचित करना होगा जिसमें राज्य उनकी मदद कर सकते हैं। वे प्रत्येक जिले में विशेष कोशिकाओं के मामलों का उल्लेख करेंगे।

बुधवार, 24 मार्च 2021

जानिए कोविड से निपटने के लिए क्या है गृह मंत्रालय के निर्देश

 लागू हुआ “परीक्षण-ट्रैक-उपचार” प्रोटोकॉल

अपने नवीनतम दिशानिर्देशों में, मंत्रालय ने घोषणा की कि सभी नए मामलों को जल्द से जल्द अलग किया जाना चाहिए या समय पर उपचार प्रदान किया जाना चाहिए। इसे संक्रमित मामलों के सभी संपर्कों को भी जल्दी और अलग-थलग करना होगा। कोरोनावायरस मामलों में स्पाइक के बीच, गृह मंत्रालय (एमएचए) ने मंगलवार को नए दिशानिर्देश जारी किए, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आरटी-पीसीआर परीक्षणों को बढ़ाने, परीक्षण-ट्रैक-ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल का सख्त प्रवर्तन सुनिश्चित करने और सभी प्राथमिकता समूहों को कवर करने के लिए टीकाकरण की गति बढ़ाने के निर्देश दिए। 

जबकि केंद्र ने अर्थव्यवस्था को चालू रखने के लिए एक और नए लॉकडाउन को लागू करने पर विचार नहीं किया, यह महत्वपूर्ण है कि नागरिक कोरोनवायरस से संबंधित उपयुक्त व्यवहार का पालन करें जैसे कि मास्क पहनना, सामाजिक दूरी और हाथ की स्वच्छता बनाए रखना, लोगों ने कहा कि घटनाक्रम से परिचित हैं। मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि "यह सुनिश्चित करने के लिए कि गतिविधियों की बहाली सफल हो और महामारी को पूरी तरह से दूर करने के लिए, केंद्र सरकार और राज्य / केंद्रशासित प्रदेश सरकारों के विभाग को निर्धारित नियंत्रण रणनीति का कड़ाई से पालन करने की आवश्यकता है, और एमएचए और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MOHHW) और अन्य मंत्रालयों द्वारा जारी दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करें”। अपने नवीनतम दिशानिर्देशों में, मंत्रालय ने घोषणा की कि सभी नए मामलों को जल्द से जल्द अलग किया जाना चाहिए या समय पर उपचार प्रदान किया जाना चाहिए। इसे संक्रमित मामलों के सभी संपर्कों को भी जल्दी और अलग-थलग करना होगा।


कोविड -19 मामलों (मंगलवार को 40,000 से अधिक मामलों में) में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, नए दिशानिर्देशों ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए ' परीक्षण-ट्रैक-उपचार ' प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू करना अनिवार्य कर दिया था, जिसमें जोर दिया गया था कि आरटी-पीसीआर परीक्षणों का अनुपात 70% या उससे अधिक के निर्धारित स्तर तक बढ़ाया जाना चाहिए। मंत्रालय ने कहा कि सकारात्मक मामलों और उनके संपर्कों पर नज़र रखने के आधार पर, ज़ोन अधिकारियों द्वारा सूक्ष्म स्तर पर जिला अधिकारियों द्वारा सावधानीपूर्वक सीमांकन किया जाएगा। कई राज्यों में असमान टीकाकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए, मंत्रालय ने कहा: “वर्तमान परिदृश्य में कोविद -19 के खिलाफ टीकाकरण, ट्रांसमिशन की श्रृंखला को तोड़ने के लिए टीकाकरण सभी प्राथमिकता समूहों को शीघ्रता से कवर करने के लिए महत्वपूर्ण है औरइसलिए सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सरकारों को तेजी से कदम बढ़ाना चाहिए।”

केंद्र ने राज्यों को स्थिति के आधार पर अपने स्थानीय प्रतिबंध जैसे रात कर्फ्यू या सप्ताहांत प्रतिबंधों को जिला, उप-जिला या शहर स्तर पर लागू करने की अनुमति दी। इसने राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि वे सार्वजनिक स्थानों पर मास्क न पहनने वालों पर उचित जुर्माना लगाएं। सभी गतिविधियों को नियंत्रण क्षेत्रों के बाहर अनुमति दी गई है और विभिन्न गतिविधियों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) निर्धारित की गई हैं। इनमें यात्री ट्रेन, हवाई यात्रा, मेट्रो ट्रेन, स्कूल, उच्च शिक्षण संस्थान, होटल और रेस्तरां, शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स और मनोरंजन पार्क, योग केंद्र और व्यायामशालाएं, प्रदर्शनियां, विधानसभाएं और मंडलियां शामिल हैं।

सोमवार, 22 मार्च 2021

देखिये पढ़े लिखे भारत की एक अनपढ़ तस्वीर



पंजाब की महिला टीचर ने अपने 13 वर्षीय छात्र से की जबरन शादी 

मांगलिक दोष को दूर करने के लिए किया विवाह 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति करने के बावजूद, भारत अभी भी अंधविश्वासों और प्रथाओं से ग्रस्त है। ऐसे ही एक मामले में, एक ट्यूशन शिक्षक ने जालंधर के बस्ती बावा खेल क्षेत्र में अपनी 'कुंडली' (जन्म कुंडली) में 'मांगलिक दोष' को दूर करने के लिए अपने 13 वर्षीय छात्र से शादी की। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिला ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि उसका परिवार चिंतित था क्योंकि उसकी शादी 'मांगलिक दोष' के कारण नहीं हो रही थी। परिवार के पुजारी ने कथित तौर पर सुझाव दिया कि उसे दोष से छुटकारा पाने के लिए एक नाबालिग लड़के के साथ एक प्रतीकात्मक विवाह करना होगा। पुजारी की सलाह से, शिक्षक ने लड़के के माता-पिता को बताया कि ट्यूशन के लिए उसे एक सप्ताह के लिए अपने घर पर रहना होगा, और आखिरकार विवाह संपन्न हुआ।


हल्दी मेहंदी से लेकर विधवा होने तक की निभाई सारी रस्मे


अपने घर लौटने पर लड़के ने पूरी घटना अपने माता-पिता को सुनाई, जिसने फिर पुलिस को मामले की सूचना दी। शिकायत के अनुसार, लड़के ने आरोप लगाया कि शिक्षक के परिवार ने एक हल्दी-मेहंदी समारोह और शादी की रात साथ रखने सहित जबरन शादी की सारी रस्में निभाईं। बाद में उसे चूड़ियाँ तोड़कर विधवा घोषित कर दिया गया और परिवार ने एक शोक सभा भी आयोजित की। इतना ही नहीं, लड़के को अपने सप्ताह भर के कारावास के दौरान घर का काम करने के लिए भी कहा जाता था। बस्ती बावा खेल थाने के स्टेशन हाउस अधिकारी गगनदीप सिंह सेखों ने कहा कि लड़के के माता-पिता ने शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद उसे वापस ले लिया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आरोपी शिक्षक परिवार को चुप कराने और उन्हें शिकायत छोड़ने का प्रयास करते हुए पुलिस स्टेशन पहुंचे।

शनिवार, 20 मार्च 2021

पहले से मजबूत हुए यौन अपराधों से संबंधित नियम, महिलाओं के हक में नई पहल

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों से निपटने के लिए न्यायाधीशों को जारी किए निर्देश


18 मार्च, 2021 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों को संभालते हुए न्यायाधीशों के लिए “क्या करें और क्या नहीं” पर 24-पृष्ठ लंबा फैसला सुनाया। न्यायपालिका में “पितृसत्तात्मक मानसिकता और गलत दृष्टिकोण” को मापने के प्रयास में, अदालत ने माना है कि "तर्क / भाषा का उपयोग जो उत्तरजीवी को तुच्छ बनाने के लिए करता है, उसे सभी परिस्थितियों में टाला जाना चाहिए"। यह घोषणा करते हुए कि “लड़कों का रवैया लड़कों का होगा” न्यायिक तर्क में कोई स्थान नहीं है, अदालत ने कहा “सभी अदालतों की भूमिका यह सुनिश्चित करने के लिए है कि उत्तरजीवी आपराधिक कार्यवाही में हर स्तर पर, अपनी निष्पक्षता और तटस्थता पर भरोसा कर सकता है, जहां वह जीवित और एक पीड़ित व्यक्ति है। यहां तक कि इस जिम्मेदारी के अप्रत्यक्ष रूप से; अदालत के निष्पक्षता में बलात्कार से बचे व्यक्ति के विश्वास को हिला देता है।


लिंग हिंसा को अक्सर बदल दिया जाता है चुप्पी की संस्कृति में 

शुरुआत में, अदालत ने माना कि लैंगिक हिंसा सबसे अधिक अनदेखी या "चुप्पी की संस्कृति में डूबी हुई" है। इसमें कहा गया है कि परिवार पर आर्थिक निर्भरता और सामाजिक बहिष्कार का डर महिलाओं के लिए किसी भी तरह की यौन हिंसा या अपमानजनक व्यवहार की रिपोर्ट करने के लिए महत्वपूर्ण विघटनकारी है। इसलिए, अदालत ने दोहराया कि यौन हिंसा के आसपास की चुप्पी की संस्कृति को तोड़ने की जरूरत है। ऐसा करने में, महिलाओं की तुलना में हिंसा को कम करने और मुकाबला करने में पुरुषों की तुलना में शायद महिलाओं की तुलना में अधिक कर्तव्य और भूमिका है।

शीर्ष न्यायालयों के पिछले निर्णयों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर राष्ट्रीय आँकड़ों पर भरोसा करते हुए, अदालत ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यौन अपराधों के मामलों में, समझौता की अवधारणा, विशेष रूप से अभियुक्त और अभियोजन पक्ष के बीच विवाह के रूप में नहीं सोचा जाएगा। क्योंकि इस तरह का कोई भी प्रयास महिला की गरिमा के लिए अपमानजनक होगा।

खत्म हुआ 'लड़कों का रवैया लड़कों का होगा' 

सर्वोच्च न्यायालय ने यह इंगित करने में संकोच नहीं किया कि न्यायपालिका में पितृसत्तात्मक और भ्रामक मानसिकता दोनों स्पष्ट और अव्यक्त है, कभी-कभी यौन हिंसा से बचे रहने के कारण होने वाले आघात को भी दर्शाता है। इस तरह के रवैये, अदालत ने देखा, न केवल विभिन्न प्रकार के कृत्य तुच्छ करते हैं, जो यौन हिंसा के घेरे में आते हैं, बल्कि उन्हें रोमांटिक भी बनाते हैं। सामाजिक दृष्टिकोण आमतौर पर अपराधों की इस श्रेणी को "मामूली" अपराधों के रूप में चिह्नित करते हैं। इस तरह के "मामूली" अपराध अफसोसजनक रूप से न केवल तुच्छ या सामान्यीकृत होते हैं, बल्कि वे रोमांटिक भी होते हैं और इसलिए, लोकप्रिय विद्या जैसे सिनेमा में शामिल होते हैं। ये दृष्टिकोण, जो "लड़कों का रवैया लड़कों का होगा" जैसे चश्मे के माध्यम से अपराध को देखते हैं और उन्हें निंदा करते हैं, फिर भी उत्तरजीवी लोगों पर इसका स्थायी और खतरनाक प्रभाव पड़ता है। इसलिए, अदालत ने स्पष्ट रूप से स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों में रूढ़ियों का सुदृढीकरण को सुदृढ़ करने पर विचार के माध्यम से, जो मामले के प्रति असंगत हैं, निष्पक्षता की अवधारणा को प्रभावित करेगा।

न्यायिक रूढ़िवादिता को किया संबोधित

  यह समझने के लिए कि इस तरह के न्यायिक आदेशों को पहली बार में क्यों पारित किया जाता है, अदालत ने “न्यायिक रूढ़िवादिता” की अवधारणा की ओर रुख किया। एक ऑस्ट्रेलियाई वकील सिमोन क्यूसैक ने न्यायिक रूढ़िवादिता को एक विशिष्ट सामाजिक समूह (जैसे महिलाओं) में उसकी सदस्यता के कारण एक विशिष्ट विशिष्ट गुण, विशेषताओं या भूमिकाओं के लिए न्यायाधीशों के अभ्यास के रूप में परिभाषित किया। अदालत ने माना कि हानिकारक रूढ़ियों को चुनौती देने की अक्षमता के कारण, न्यायाधीश अक्सर कानूनी कार्यवाही में इस तरह के पूर्वाग्रहों को समाप्त कर सकते हैं। 

न्यायाधीश हानिकारक रूढ़ियों की न्याय प्रणाली से छुटकारा पाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनके पास कानून और तथ्यों पर अपने फैसलों को सबूतों में आधार बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, न कि लिंग रूढ़िवादिता में लिप्त होना। इसके लिए जजों को लिंग रूढ़िवादिता की पहचान करने की आवश्यकता होती है, और यह पहचानना है कि इन रूढ़ियों के आवेदन, प्रवर्तन या अपराध कैसे महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करते हैं या उन्हें न्याय के लिए समान पहुंच से वंचित करते हैं।"

अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि एक 'आदर्श बलात्कार पीड़िता' की रूढ़िवादिता यौन हमले के जटिल जीवित अनुभवों को कमज़ोर करती है। इसलिए, अदालत ने सामुदायिक सेवा जैसी शर्तों को उजागर किया, जो उत्तरजीवी को होने वाले नुकसान को कम करती है, ऐसे बचे लोगों को "दूसरे शिकार" के अधीन करने की क्षमता रखती है।

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

ऐसी शिक्षा युवा पीढ़ी की मानसिकता के लिए हो सकती है खतरा

 
 

युवा पीढ़ी के लिए ऐसी बातें कर सकती है उनके भविष्य को बर्बाद
 
क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है
 
कांग्रेस की अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ द्वारा जयपुर में दर्ज एक शिकायत पर, राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल और प्रकाशन गृह के मालिक संजीव पासबुक प्रकाशन के खिलाफ राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कक्षा 12 की राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ने के लिए एक एफआईआर दर्ज की गई है। । धार्मिक भावनाओं और आपराधिक साजिश के आरोपों को लागू किया गया है। पाठ्यपुस्तक में 'आतंकवाद, राजनीति और भ्रष्टाचार का अपराधीकरण' नामक अध्याय में कहा गया है, "निम्नलिखित में से कौन इस्लामी आतंकवाद का मुख्य उद्देश्य नहीं है?" और दुनिया में मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना के रूप में विकल्प देता है; हिंसक गतिविधियों के माध्यम से पश्चिमी गैर-मुस्लिम शक्तियों का प्रतिरोध; विश्व में शांति; दुनिया में इस्लामी कानूनों और सिद्धांतों को लागू करें।” यह आगे एक प्रश्न जोड़ता है जिसमें लिखा है, "आप इस्लामिक आतंकवाद से क्या समझते हैं?"
 
आतंकवाद को किसी भी विशेष धर्म से जोड़ना है गलत
 इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिकी मोहसिन रशीद ने दर्ज की है, जो राजस्थान मुस्लिम मंच और कांग्रेस की राज्य इकाई के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के समन्वयक हैं। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा, “इस्लाम को आतंकवाद के साथ सीधे जोड़कर और फिर’ इस्लामी आतंकवाद ’का उपयोग करके, किताबें इस्लाम के प्रति नफरत को बढ़ावा देती हैं और धर्म को बदनाम करती हैं। वे मुस्लिम छात्रों और समुदाय को भड़काने की कोशिश करते हैं और उनकी भावनाओं को आहत करते हैं। यह मुस्लिम शिक्षकों और छात्रों को उनके धर्म का अपमान करने और उन्हें अपमानित करके अपमानित करने का एक प्रयास भी है” । 2018 में पिछली वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान इस पाठ्यपुस्तक की सामग्री को संशोधित किया गया था। दिसंबर 2018 में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद, राज्य बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों को फिर से संशोधित किया गया था और इस हिस्से को समाप्त कर दिया गया था। पुस्तक के संयोजक, एसोसिएट प्रोफेसर भंवर सिंह राठौर का पिछले साल सितंबर में निधन हो गया था।
 
वर्तमान राज्य सरकार ने पाठ्यपुस्तकों को NCERT पाठ्य पुस्तकों से दिया बदल
 
इस बीच, प्रकाशन गृह ने बुधवार को कुछ लोगों द्वारा पाठ से अपमानित किया गया था। इस मामले में, मुस्लिम परिषद संस्थान के अध्यक्ष यूनुस चोपदार को दो अन्य व्यक्तियों के साथ गिरफ्तार किया गया है। पब्लिशिंग हाउस ने कहा है कि उन्होंने किताबों को नष्ट कर दिया था और लिखित रूप में माफी मांगी थी, लेकिन फिर भी उन्हें धमकी मिली। सरकारी स्कूल, जोधपुर के पूर्व प्रिंसिपल बंसीलाल जाखड़ तीन सदस्यीय समिति में से एक थे, जिन्होंने अध्याय का हिंदी अनुवाद किया। जाखड़ ने टीओआई को बताया, "मैंने इस खंड के साथ व्यवहार नहीं किया था और इसे प्रकाशित होने तक पता नहीं चला था।" वर्तमान राज्य सरकार ने राज्य की पाठ्यपुस्तकों को NCERT पाठ्य पुस्तकों से बदल दिया है।