मामले का इतिहास
इस साल जनवरी में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निर्दोष घोषित किए जाने से पहले एक बलात्कार के मामले में 20 साल जेल में बिताने वाला उत्तर प्रदेश का एक व्यक्ति बुधवार शाम को आगरा सेंट्रल जेल चला गया। विष्णु तिवारी को 16 सितंबर 2000 को गिरफ्तार किया गया था और एससी / एसटी अधिनियम के तहत बलात्कार और अत्याचार के लिए दोषी ठहराया गया था। तीन साल बाद उन्हें ललितपुर की अदालत ने बलात्कार का दोषी ठहराया और 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। उन्हें एससी / एसटी अधिनियम के तहत आगे दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। ट्रायल कोर्ट के निर्देशानुसार सभी सजाएँ समवर्ती रूप से चलनी थीं। उन पर अपने गाँव की एक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया था; उसने कहा कि विष्णु तिवारी ने उसके साथ मारपीट की थी क्योंकि वह अपने घर से खेतों में काम करने जा रही थी।
आज शाम आगरा सेंट्रल जेल के विजुअल्स ने विष्णु तिवारी को जेल के गेट से बाहर निकलते हुए अपने हाथ से जारी आदेश के साथ दिखाया। विष्णु तिवारी ने एक साक्षात्कार में एनडीटीवी को बताया कि "मैं 20 साल से जेल में हूं, मेरा केवल एक छोटा भाई है, मैं शादीशुदा नहीं हूं, मेरा शरीर टूट गया है, मेरे हाथों को देखें; जेल की रसोई में काम करने से छाले हैं।” "आज जाने से पहले मुझे जेल प्रशासन से 600 मिला। मेरे पास बस इतना ही है।" सबसे पहले 2013 में उसके पिता की मौत हो गईएक साल बाद ही मां भी चल बसी। उसके बाद उसके दो बड़े भाई भी यह दुनिया छोड़कर चले गए। विष्णु पांच भाइयों में तीसरे नंबर का है।
आगरा के रहने वाले सोशल और आरटीआई एक्टिविस्ट नरेश पारस ने इस संबंध में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को एक पत्र लिखा है। नरेश पारस का कहना है कि विष्णु के मामले में पुलिस ने सही तरीके से जांच नहीं की। जिसके चलते विष्णु को अपनी जवानी के 20 साल जेल में बिताने पड़े। जब विष्णु जेल में आया था तो उसकी उम्र 25 साल थी, आज वो 45 साल का होकर जेल से बाहर आया है और अब # विष्णु_को _न्याय_दो। दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करने के साथ ही विष्णु को मुआवजा दिया जाए, मुआवजे की रकम पुलिसकर्मियों के वेतन से काटी जाए। जेल में रहने के दौरान विष्णु मेस में दूसरे बंदियों के लिए खाना बनाता है। इतने साल में वो एक कुशल रसोइया बन चुका है। साथी बंदियों का कहना है कि काम का वक्त हो या खाली बैठा हो, विष्णु सिर्फ एक ही गाना गाता है; जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-शाम। विष्णु का कहना है कि इसी गाने में ज़िदगी का फलसफा छिपा हुआ है। जेल से छूटने के बाद विष्णु का इरादा एक छोटा सा ढाबा चलाने का है। लेकिन अभी उसके पास इतनी पूंजी नहीं है, इसलिए पहले कहीं नौकरी कर पूंजी जमा करेगा।

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