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शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

कामकाज़ी महिलाओं में माहवारी के दौरान हो रहे शोषण पर सख्त कदम की जरुरत

          भारत में अन्य देशों की तुलना में हो रहा है  कामकाज़ी महिलाओं का शोषण

            माहवारी के दौरान अन्य देशों के बनाये गए कानून को लागू  करने की है जरुरत


भारत एक पुरुष प्रधान देश माना जाता रहा है,  जिसमे महिलाओं के हितों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना क़ी पुरुष के हितों पर।  लेकिन फिर भी सरकारें अपने कागज़ो में महिला सशक्तिकरण जैसे अभियान चला कर समाज और जनता में इस तरह के प्रचार'करने में सफल रही है कि  वो महिला हितेषी है, और महिलाओं को पुरुषों  के बराबर हक़ दिलवाने के लिए संघर्षरत है।  लेकिन क्या कभी इस बात को सोचने की जरुरत महसूस हुई की क्या सरकार द्वारा चलाये गए अभियान और योजनाएँ सफल रही या असफल।  क्या इन योजनाओं का वास्तविकता के धरातल पर उतना प्रभाव पड़ा जिस मकसद से ये योजना बनाई गई थी।  
क्या महिला सशक्तिकरण के विज्ञापनों पर करोड़ो खर्च देने के बावजूद आज इस देश की महिला सशक्त है या आज भी वही हाल है।

हाल ही में देश के विभिन्न हिस्सों से आई खबरें बड़ी ही दर्दनाक और हैरान कर देने वाली हैं, जिसमे दक्षिण भारत के तमिनलाडु प्रान्त में थॉमसन रूटर्स फाउंडेशन ने एक प्रतिष्ठित गारमेंट्स कम्पनी में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार को उजागर किया है, जिसमे कम्पनी के अधिकारी कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दौरान बिना किसी चिक्तिसक की अनुमति के ,बिना किसी नाम की दवाइयाँ  खिला देते थे, जिससे कि  उनकी माहवारी के दौरान उनको दर्द न हो , वो काम पर आती रहें और उनको छुट्टी न लेनी पड़े।  इस कंपनी की महिलाओं  ने बताया की इस दवाई को लेने के कुछ समय  बाद उनको कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा जिसमे दिमागी परेशानी ,तनाव , मूत्र संक्रमण और गर्भपात जैसी बिमारियां शामिल थी।  इस संगठन के लोगों ने गहरी जाँच पड़ताल में पाया कि  कंपनी के अधिकारीयों का इन महिलाओं पर बहुत तकड़ा नियंत्रण था, जिससे कि  वो शौच भी सही समय पर नहीं जा पाती  थी।

                 

हीं एक दूसरा मामला महाराष्ट्र के बीड क्षेत्र का है, जहाँ गन्ना काटने वाली महिलाओं की बच्चेदानी को बाहर निकलवा दिया जाता है।  द हिन्दू की ख़बर के मुताबिक यह कहा गया है कि  इस क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसी महिला होगी जिसने एक या दो बच्चों के बाद अपनी बच्चेदानी का ऑपरेशन न करवाया हो।  महिलाओं  से बात करने के बाद यह पता चला कि   गन्ना कटवाने वाले ठेकेदार उन्हें ऑपरेशन करवाने के लिए पैसे  उधार दे देते हैं जिसको वे मजदूरी करके चुका देती है। महिलाओं ने बताया की ठेकेदार ये नहीं चाहते की काम के दौरान उनको किसी भी वजह से कोई छुट्टी लेनी पड़े।   महिलाओं की इस तरह के ऑपेरशन के बाद दिमागी परेशानी, वजन बढ़ जाना और हार्मोन में अंसतुलन जैसी कई बीमारियों से ग्रसित भी देखा गया।  एक हिंदी अख़बार की ख़बर के मुताबिक पुरे बीड क्षेत्र में तीन साल में ४६०० महिलाओं के गर्भाशय निकाले जा चुके है, जिसकी जाँच के आदेश सरकार ने दे दिए है।
 उपरोक्त  घटनाएं  इस तरह की  वो घटनाएं है जो सामने आ गई हैं , १२५ करोड़ के देश में जहां आधी से ज्यादा आबादी गरीबी के साये में जी रही है, वहां इस तरह की सैंकड़ों हजारों घटनाएं नहीं होगी इस बात से कतई इन्कार नहीं किया जा सकता।
अगर हम दूसरे देशों की बात करें तो इन देशों में महिलाओं की माहवारी के लिए विशेष कानून बनाये गए है फिर वो चाहे राजकीय विभाग में काम कर रही हो या निजी किसी कम्पनी में।  जापान , ताइवान , दक्षिण कोरिया , रूस जैसे देशो में जहां महिलाएं पुरुषों के बराबर काम करती है वहां इस चीज़ को लेकर बड़े सख्ती से कानून बनाये हुए है जिसमे महिलाओं को माहवारी के दौरान जहाँ अवकाश का प्रावधान है वहीं अगर महिलाओं को काम पर आना भी पड़े तो उनको विशेष सुविधाएं हासिल है।
       इस कहानी का निष्कर्ष क्या है , यही कि जिस देश में हम नारी को देवी  का दर्ज़ा देते है उस देश में नारी के ये हालात हैं।  इससे अच्छा तो दुनिया के दूसरे देश है जो दिखावे में विश्वास न करके लोगों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध करवाते हैं।  सिर्फ पैडमैन जैसी फिल्में बनाने से हम ये नहीं मान सकते कि  इस तरह की समस्या से छुटकारा मिल गया है।  सच तो यह है कि  जिन लोगों के लिए इस तरह की फिल्में  बनती है उनको न तो फिल्म देखने की फुर्सत है और न ही १० रूपये वाले पॉपकॉर्न १५० रूपये में लेकर खाने का बजट।
           मेरा सरकार में शीर्ष पदों पर बैठे योजनाकारों से यही आग्रह है कि समाज की इस तरह की छुपी हुई और मार्मिक समस्याओं के लिए जहां एक तरफ विशेष कानून बनाये जाये वहीं ऐसे मामलों में लापरवाही बरतने वाले अधिकारीयों , निजी कम्पनी के मालिकों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाये।  आखिर "यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता "  का उद्घोष यूँ अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन देने से चरितार्थ नहीं होगा।

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